हैप्पी मकर संक्रांति 2020 शुभमुहूर्त व देवताओं का दिन क्यों कहा जाता है मकर संक्रांति पर दान का है बड़ा महत्व जाने ऐसा क्यों

हैप्पी मकर संक्रांति 2020 शुभमुहूर्त व देवताओं का दिन क्यों कहा जाता है मकर संक्रांति पर दान का है बड़ा महत्व जाने ऐसा क्यों :- हैप्पी मकर संक्रांति का पर्व इस बार 15 जनवरी 2020 को मनाया जाएगा | मकर संक्रांति का पर्व जनवरी महीने के 14 और 15 तारीख को मनाया जाता है| ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है, तब मकर संक्रांति होती है इस साल 2020 में मकर संक्रांति में 14 जनवरी 2020 की रात्रि में सूर्य उतरायण होगें और 15 जनवरी 2020 को मकर संक्रांति का पर्व मनाया गाएगा यह कहना गलत है की सूर्य इसी दिन उतरायण भी होता है तथ्य यह है की उतरायण का प्रारम्भ 21 22 दिसंबर का होता है लगभग अठारह सौ साल पहले ग्रह गणित के करण संक्रांति और उतरायण स्थिति एक ही समय होती थी इसी वजह से कुछ जगह संक्रांति और उतरायण को एक ही समझा जाता है
उदाहरण के लिए तमिलनाडू में इसे पोंगल के रूप में मनाते है कर्नाटक केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे सिर्फ संक्रांति कहते है जिसे गोआ,ओडिशा, हरियाणा, बिहार, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उतर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, और जम्मू आदि प्रांतों में मकर संक्रांति कहते है हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में एक दिन पूर्व इस बार 14 जनवरी को ही मनाया जाता है पौष संक्रांति मकर संक्रांति आदि भी प्रसिद्ध नाम है

मकर संक्रांति

हैप्पी मकर संक्रांति 2020 शुभमुहूर्त 14 व 15 जनवरी 2020

हैप्पी मकर संक्रांति 2020 :-  शुभमुहूर्त 14 व 15 जनवरी 2020 :-  इस साल मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को मनाया जायेगा। दरअसल इस बार सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी को शाम 7 बजकर 50 मिनट पर हो रहा है और शास्त्रों के नियमानुसार अगर शाम को मकर संक्रांति का पर्व पड़ता है तो इसे अगले दिन मनाया जाता है। इसीलिए 2019 में मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को मनाया जायेगा। शास्त्रों में बताया गया है कि संक्रांति के दिन शुरू के छह घंटे के अंदर यदि दान पुण्य किया जाये तो उसका विशेष महत्व होता है इस लिहाज से 14 जनवरी को शाम 7.50 के बाद छह घंटे तक किये गये दान का अभीष्ट लाभ मिलेगा। हालांकि 15 जनवरी को भी पूरे दिन दान पुण्य के कार्य किये जा सकते हैं।

मकर संक्रांति पर तिल के महत्व की पौराणिक कहानी

एक पौराणिक कथा के अनुसार शनि देव को उनके पिता सूर्य देव पसंद नहीं करते थे. इसी कारण सूर्य देव ने शनि देव और उनकी मां छाया को अपने से अलग कर दिया. इस बात से क्रोध में आकर शनि और उनकी मां ने सूर्य देव को कुष्ठ रोग का श्राप दे डाला पिता को कुष्ठ रोग में पीड़ित देख यमराज (जो कि सूर्य भगवान की दूसरी पत्नी संज्ञा के पुत्र हैं) ने तपस्या की. यमराज की तपस्या से सूर्यदेव कुष्ठ रोग से मुक्त हो गए. लेकिन सूर्य देव ने क्रोध में आकर शनि देव और उनकी माता के घर ‘कुंभ’ (शनि देव की राशि) को जला दिया. इससे दोनों को बहुत कष्ट हुआ.

मकर संक्रांति

देवताओं का दिन क्यों कहा जाता है मकर संक्रांति को (उतरायण काल को)

उतरायण काल को ऋषि मुनियों ने जप तप और सिद्धि प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना है। मकर संक्रांति दिन इसे देवताओं का दिन माना जाता है। गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने कहा है। कि उत्तरायण के छह माह में पृथ्वी प्रकाशमय होती है। इसके अलावा उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि माना गया है। भावात्मक रूप से उत्तरायण शुभ और प्रकाश का प्रतीक है। तो दक्षिणायन कंलक कालिमा का मार्ग मानते हैं। श्रीकृष्ण ने इसे पुनरावृत्ति देने वाला धूम्र मार्ग वाला कहा है

 मकर संक्रांति पर दान का है बड़ा महत्व जाने ऐसा क्यों जिससे आपको अच्छा लाभ हो

इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान देना बेहद पुण्यकारी माना जाता है। इस दिन खिचड़ी का दान देना विशेष रूप से फलदायी माना गया है। देश के विभिन्न मंदिरों को इस दिन विशेष रूप से सजाया जाता है और इसी दिन से शुभ कार्यों पर लगा प्रतिबंध भी खत्म हो जाता है। इस पर्व पर उत्तर प्रदेश में खिचड़ी सेवन एवं खिचड़ी दान का अत्यधिक महत्व होता है। महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रांति पर कपास, तेल, नमक आदि वस्तुएं अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन कूड़ा करकट जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है।

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