Janmashtami 2020 Date And Timing Puja Vidhi श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि शुभ मुहूर्त

Janmashtami 2020 Date And Timing Puja Vidhi

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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

Krishna Janmashtami Date and Auspicious Time

कृष्ण जन्माष्टमी 2020
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी : बुधवार 12 अगस्त 2020 को
निशिता पूजा का समय :- 12:05 AM से 12:47 AM
अवधि : 00 घण्टे 43 मिनट्स
पारण समय : 11:16 AM

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पूजा विधि 2020

Krishna Janmashtami Puja Vidhi 2020

  • श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत वाले दिन सुबह स्नान करने के बाद सभी देवताओं के नमस्कार करे /
  • और पूर्व या उतर को मुख करके बैठे हाथ में जल फल और पुष्प को लेकर संकल्प करे.
  • मध्यान्ह के समय काले तिलों के जल स्नान करने के लिए देवकी जी के लिए प्रस्तुति ग्रह बनाए.
  • अब सूतिका ग्रह में सुंदर बी बिछाने बिछा कर उस पर शुभ कलश की स्थापना करे.
  • इसके साथ ही भगवान श्रीकृष्ण जी को स्तनपान कराती माता देवकी जी की मूर्ति या चित्र का स्थापना करें.
  • पूजा में देवकी वासुदेव बलराम नन्द यशोदा और लक्ष्मी जी इन सबका नाम लेते हुए विधिवत पूजा करे.
  • यह व्रत रात्रि बारह बजे के बाद खोला जाता है .
  • इस व्रत में अनाज नही खाया जाता है फलाहर के रूप में कुट्टू के आते की पकोड़ी मावे की बर्फी और सिघाड़े के आटे का हलवा बनाया जाता है

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

Janmashtami Fast Story

जन्माष्टमी व्रत कथा : स्‍कंद पुराण के मुताबिक द्वापर युग की बात है। तब मथुरा में उग्रसेन नाम के एक प्रतापी राजा हुए। लेकिन स्‍वभाव से सीधे-साधे होने के कारण उनके पुत्र कंस ने ही उनका राज्‍य हड़प लिया और स्‍वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन थी, जिनका नाम था देवकी। कंस उनसे बहुत प्रेम करता था। देवकी का विवाह वसुदेव से तय हुआ तो विवाह संपन्‍न होने के बाद कंस स्‍वयं ही रथ हांकते हुए बहन को ससुराल छोड़ने के लिए रवाना हुआ। जब वह बहन को छोड़ने के लिए जा रहे था, तभी एक आकाशवाणी हुई कि देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान कंस की मृत्यु का कारण बनेगी। यह सुनते ही कंस क्रोधित हो गया, और देवकी और वसुदेव को मारने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा तभी वसुदेव ने कहा कि वह देवकी को कोई नुकसान न पहुंचाए। वह स्‍वयं ही देवकी की आठवीं संतान कंस को सौंप देगा। इसके बाद कंस ने वसुदेव और देवकी को मारने के बजाए कारागार में डाल दिया।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

कारागार में ही देवकी ने सात संतानों को जन्‍म दिया, और कंस ने सभी को एक-एक करके मार दिया। इसके बाद जैसे ही देवकी फिर से गर्भवती हुईं तभी कंस ने कारागार का पहरा और भी कड़ा कर दिया। तब भाद्रपद माह के कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी को रोहिणी नक्षत्र में कन्‍हैया का जन्‍म हुआ। तभी श्री विष्‍णु ने वसुदेव को दर्शन देकर कहा कि वह स्‍वयं ही उनके पुत्र के रूप में जन्‍में हैं। उन्‍होंने यह भी कहा कि वसुदेव जी उन्‍हें वृंदावन में अपने मित्र नंदबाबा के घर पर छोड़ आएं, और यशोदा जी के गर्भ से जिस कन्‍या का जन्‍म हुआ है, उसे कारागार में ले आएं। यशोदा जी के गर्भ से जन्‍मी कन्‍या कोई और नहीं बल्कि स्‍वयं माया थी। यह सबकुछ सुनने के बाद वसुदेव जी ने वैसा ही किया।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

स्‍कंद पुराण के मुताबिक जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के बारे में पता चला तो वह कारागार पहुंचा। वहां उसने देखा कि आठवीं संतान तो कन्‍या है, फिर भी वह उसे जमीन पर पटकने ही लगा कि वह मायारूपी कन्‍या आसमान में पहुंचकर बोली कि रे मूर्ख मुझे मारने से कुछ नहीं होगा। तेरा काल तो पहले से ही वृंदावन पहुंच चुका है, और वह जल्‍दी ही तेरा अंत करेगा। इसके बाद कंस ने वृंदावन में जन्‍में नवजातों का पता लगाया। जब यशोदा के लाला का पता चला तो उसे मारने के लिए कई प्रयास किए। कई राक्षसों को भी भेजा लेकिन कोई भी उस बालक का बाल भी बांका नहीं कर पाया, तो कंस को यह अहसास हो गया कि नंदबाबा का बालक ही वसुदेव-देवकी की आठवीं संतान है। कृष्‍ण ने युवावस्‍था में कंस का अंत किया। इस तरह जो भी यह कथा पढ़ता या सुनता है उसके समस्‍त पापों का नाश होता है।

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